Saturday, July 24, 2010

GEETA SAAR

•क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? अात्मा ना पैदा होती है, न मरती है।


•जो हुअा, वह अच्छा हुअा, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

•तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर अाए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

•खाली हाथ अाए अौर खाली हाथ चले। जो अाज तुम्हारा है, कल अौर किसी का था, परसों किसी अौर का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।

•परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

•न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, अाकाश से बना है अौर इसी में मिल जायेगा। परन्तु अात्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?

•तुम अपने अापको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।

•जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का अानंन्द अनुभव करेगा

Thursday, July 22, 2010

STORY FOR LIFE

ज़िन्दगी बड़ी नागवार गुज़री है !

क़रार पा के ये, बेकरार गुज़री है !!



गमों की शाम भी आई थी तसल्ली देने !

करीब आके मेरे अश्क़बार गुज़री है !!



शम्मा की लौ में जलने की तमन्ना लेकर !

तड़प – तड़प के सहर बार बार गुज़री है !!



शज़र उदास है,मौसम भी है धुआं – धुआं !

नज़र चुरा के अबके बहार गुज़री है !!



मेरे क़ातिल मेरे मुंसिफ के इशारों पर !

रिहाई मुझसे अब दरकिनार गुज़री है !!

Wednesday, July 21, 2010

SH. KABEER DAS JI

SH. KABIR DAS
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।


जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥



माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥



माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।

कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥



तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।

कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥



गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥



सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।

कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥



साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥



धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥



कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥



माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥



रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥



दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥



बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥



साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।

सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥



साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।

मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥



जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।

तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥



उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।

तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥



सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।

धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न